भारत सरकार द्वारा हाल ही में लागू की गई नई श्रम संहिताएँ—वेतन संहिता 2019, औद्योगिक संबंध संहिता 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संहिता 2020—देश की श्रम व्यवस्था में सबसे बड़ा ढांचागत बदलाव मानी जा रही हैं। इन चार कोड्स के साथ पुराने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को एकीकृत कर दिया गया है, ताकि व्यवस्था सरल, पारदर्शी और आधुनिक बन सके।
नई श्रम संहिताओं में सबसे बड़ा परिवर्तन “वेतन” की एक समान परिभाषा है, जिसके तहत कुल वेतन का कम से कम 50% हिस्सा बेसिक पे और भत्तों के रूप में निर्धारित किया गया है। इसका असर पीएफ, ग्रेच्युटी और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभों पर पड़ेगा। पहली बार गिग वर्कर्स, प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स और कॉन्ट्रैक्ट श्रमिकों को भी सोशल सिक्योरिटी के दायरे में लाया गया है। वहीं महिलाओं को उनकी सहमति से रात की पाली में काम करने की अनुमति दी गई है। सरकार का दावा है कि इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और श्रमिकों को अधिक सुरक्षा मिलेगी।

हालाँकि, इन संहिताओं को लेकर कई नकारात्मक पहलू और विरोध के स्वर भी सामने आए हैं। औद्योगिक संबंध संहिता के तहत हड़ताल को लेकर नई कठोर शर्तें लागू की गई हैं, जिनमें लंबी नोटिस अवधि का नियम शामिल है। यूनियनों का कहना है कि इससे मजदूरों की सामूहिक बातचीत की शक्ति कमजोर हो सकती है। विशेषज्ञों का दावा है कि फिक्स्ड-टर्म रोजगार को बढ़ावा मिलने से स्थायी नौकरियों में कमी आएगी और नौकरी की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी।
इसके अलावा, बिना सरकारी अनुमति के छंटनी और कर्मचारियों की संख्या में बदलाव की स्वतंत्रता को लेकर भी आपत्तियाँ उठी हैं, जिसे कई संगठनों ने “नियोक्ता हितैषी” बताया है। साथ ही चिंता है कि काम के घंटों में लचीलापन कंपनियों द्वारा दुरुपयोग का कारण बन सकता है। गिग और असंगठित श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए स्पष्ट रोडमैप की कमी भी एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है।
नई संहिताएँ देश की अर्थव्यवस्था और श्रमिक वर्ग के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करेंगी, यह आने वाले महीनों में इनके वास्तविक क्रियान्वयन से स्पष्ट होगा।