बिहार में सड़क हादसों का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। लगभग हर दिन किसी न किसी जिले से दुर्घटनाओं में मौत और घायल होने की खबरें सामने आती हैं। यह स्थिति सिर्फ दुखद नहीं, बल्कि राज्य की सड़क सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इन हादसों के पीछे कई कारण एक साथ जिम्मेदार हैं, जिन पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है।
सबसे बड़ी समस्या तेज़ रफ़्तार और लापरवाही है। खासकर हाईवे पर स्पीड लिमिट की अनदेखी, ओवरटेकिंग और बिना हेलमेट बाइक चलाना आम बात है। सड़क की खराब हालत भी बड़ा कारण है—कई मुख्य सड़कों पर गड्ढे और टूटी सतह वाहन चालकों के लिए खतरा बन चुकी है। रात में स्ट्रीट लाइट्स की कमी होने से दुर्घटनाओं की संभावना और बढ़ जाती है।
ट्रैफिक व्यवस्था की कमजोरियों पर भी उंगली उठती है। कई जगह अतिक्रमण के कारण सड़कें संकरी हो जाती हैं, जिससे वाहन चालकों को परेशानी होती है। इसके अलावा, ड्राइवरों में ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूकता की कमी और सार्वजनिक परिवहन का अव्यवस्थित संचालन भी हादसों का एक प्रमुख कारण है। आपातकालीन सेवाओं की देरी भी कई बार जान बचाने का मौका खो देती है।

समाधान के लिए सरकार और जनता दोनों को मिलकर काम करना होगा। सबसे पहले, स्पीड नियंत्रण और ट्रैफिक नियमों की सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा। शहरों और हाईवे पर सीसीटीवी और ई-चालान जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए। सड़क मरम्मत और रखरखाव को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है ताकि गड्ढा-मुक्त सड़कें बन सकें। हेलमेट और सीट बेल्ट पर बिना समझौता सख्त कार्रवाई जरूरी है।
साथ ही, लोगों को जागरूक करने के लिए स्कूल, कॉलेज और सार्वजनिक स्थलों पर नियमित अभियान चलाने चाहिए। तेजी से प्रतिक्रिया देने वाली एंबुलेंस सेवा भी इन हादसों में मौतों को कम कर सकती है।
बिहार में सड़क सुरक्षा तभी बेहतर होगी जब नियम, व्यवस्था और जागरूकता—तीनों पर समान रूप से ध्यान दिया जाए।
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